Thursday, November 3, 2016

गर्भाधान

 

गर्भाधान के लिए उत्तम समय कौन-सा ?

ऋतुकाल की उत्तरोत्तर रात्रियों में गर्भाधान श्रेष्ठ है लेकिन 11वीं व 13 वीं रात्रि वर्जित है।

यदि पुत्र की इच्छा करनी हो तो पत्नी को ऋतुकाल की 4,6,8,10 व 12वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद कर समागम करना चाहिए।

यदि पुत्री की इच्छा हो तो ऋतुकाल की 5,7 या 9वीं रात्रि में से किसी एक रात्रि का शुभ मुहूर्त पसंद करना चाहिए।

कृष्णपक्ष के दिनों में गर्भ रहे तो पुत्र व शुक्लपक्ष में गर्भ रहे तो पुत्री पैदा होने की सम्भावना होती है।

रात्रि के शुभ समय में से भी प्रथम 15 व अंतिम 15 मिनट का त्याग करके बीच का समय गर्भाधान के लिए निश्चित करें।

गर्भाधान हेतु सप्ताह के 7 दिनों की रात्रियों के शुभ समय इस प्रकार हैं-क

रविवार – 8 से 9 और 9.30 से 3.00

सोमवार – 10.30 से 12.00 और 1.30 से 3.00

मंगलवार – 7.30 से 9 और 10,30 से 1.30

बुधवार – 7.30 से 10.00 और 3.00 से 4.00

गुरुवार 12.00 से 1.30

शुक्रवार – 9.00 से 10.30 और 12.00 से 3.00

शनिवार – 9.00 से 12.00

 

गर्भधारण के पूर्व कर्तव्य

रात्रि के समय कम-से-कम तीन दिन पूर्व निश्चित कर लेना चाहिए। निश्चित रात्रि में संध्या होने से पूर्व पति-पत्नी को स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहन कर सदगुरू व इष्टदेवता की पूजा करनी चाहिए।

गर्भाधान एक प्रकार का यज्ञ है। इसलिए इस समय सतत यज्ञ की भावना रखनी चाहिए। विलास की दृष्टि नहीं रखनी चाहिए।

दम्पत्ति अपनी चित्तवृत्तियों को परमात्मा में स्थिर करके उत्तम आत्माओं का आवाहन करते हुए प्रार्थना करेः 'हे ब्रह्माण्ड में विचरण कर रही सूक्ष्म रूपधारी पवित्र आत्माओ ! हम दोनों आपको प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारे घर, जीवन व देश को पवित्र तथा उन्नत करने के लिए आप हमारे यहाँ जन्म धारण करके हमें कृतार्थ करें। हम दोनों अपने शरीर, मन, प्राण व बुद्धि को आपके योग्य बनायेंगे।'

पुरुष दायें पैर से स्त्री से पहले शय्या पर आरोहण करे और स्त्री बायें पैर से पति के दक्षिण पार्श्व में शय्या पर चढ़े। तत्पश्चात शय्या पर निम्निलिखित मंत्र पढ़ना चाहिएः

अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठासि धाता

त्वां दधातु विधाता त्वां दधातु ब्रह्मवर्चसा भवेति।

ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोम सूर्यस्तथाऽश्विनौ।

भगोऽथ मित्रावरूणौ वीरं ददतु मे सुतम्।।

हे गर्भ ! तुम सूर्य के समान हो। तुम मेरी आयु हो, तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिष्ठा हो। धाता (सबके पोषक ईश्वर) तुम्हारी रक्षा करें, विधाता (विश्व के निर्माता ब्रह्मा) तुम्हारी रक्षा करें। तुम ब्रह्मतेज से युक्त होओ।

ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, अश्विनीकुमार और मित्रावरूण जो दिव्य शक्तिरूप हैं, वे मुझे वीर पुत्र प्रदान करें।

(चरक संहिता, शारीरस्थानः 8.8)

दम्पत्ति गर्भ के विषय मे मन लगाकर रहें। इससे तीनों दोष अपने-अपने स्थानों में रहने से स्त्री बीज को ग्रहण करती है। विधिपूर्वक गर्भाधारण करने से इच्छानुकूल फल प्राप्त होता है।

गर्भधारण के पूर्व कर्तव्यः

रात्रि के समय कम-से-कम तीन दिन पूर्व निश्चित कर लेना चाहिए। निश्चित रात्रि में संध्या होने से पूर्व पति-पत्नी को स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहन कर सदगुरू व इष्टदेवता की पूजा करनी चाहिए।

गर्भाधान एक प्रकार का यज्ञ है। इसलिए इस समय सतत यज्ञ की भावना रखनी चाहिए। विलास की दृष्टि नहीं रखनी चाहिए।

दम्पत्ति अपनी चित्तवृत्तियों को परमात्मा में स्थिर करके उत्तम आत्माओं का आवाहन करते हुए प्रार्थना करेः 'हे ब्रह्माण्ड में विचरण कर रही सूक्ष्म रूपधारी पवित्र आत्माओ ! हम दोनों आपको प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारे घर, जीवन व देश को पवित्र तथा उन्नत करने के लिए आप हमारे यहाँ जन्म धारण करके हमें कृतार्थ करें। हम दोनों अपने शरीर, मन, प्राण व बुद्धि को आपके योग्य बनायेंगे।'

पुरुष दायें पैर से स्त्री से पहले शय्या पर आरोहण करे और स्त्री बायें पैर से पति के दक्षिण पार्श्व में शय्या पर चढ़े। तत्पश्चात शय्या पर निम्निलिखित मंत्र पढ़ना चाहिएः

अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठासि धाता

त्वां दधातु विधाता त्वां दधातु ब्रह्मवर्चसा भवेति।

ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोम सूर्यस्तथाऽश्विनौ।

भगोऽथ मित्रावरूणौ वीरं ददतु मे सुतम्।।

हे गर्भ ! तुम सूर्य के समान हो। तुम मेरी आयु हो, तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिष्ठा हो। धाता (सबके पोषक ईश्वर) तुम्हारी रक्षा करें, विधाता (विश्व के निर्माता ब्रह्मा) तुम्हारी रक्षा करें। तुम ब्रह्मतेज से युक्त होओ।

ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, अश्विनीकुमार और मित्रावरूण जो दिव्य शक्तिरूप हैं, वे मुझे वीर पुत्र प्रदान करें।

(चरक संहिता, शारीरस्थानः 8.8)

दम्पत्ति गर्भ के विषय मे मन लगाकर रहें। इससे तीनों दोष अपने-अपने स्थानों में रहने से स्त्री बीज को ग्रहण करती है। विधिपूर्वक गर्भाधारण करने से इच्छानुकूल फल प्राप्त होता है।

सगर्भावस्था के दौरान आचरण

सगर्भावस्था में गर्भिणी अपानवायु, मल, मूत्र, डकार, छींक, प्यास, भूख, निद्रा, खाँसी, थकानजनित श्वास, जम्हाई, अश्रु – इन स्वाभाविक वेगों को न रोके तथा प्रयत्नपूर्वक वेगों को उत्पन्न न करे।

सख्त व टेढ़े स्थान पर बैठना, पैर फैलाकर और झुककर ज्यादा समय बैठना वर्जित है।

आयुर्वेद के अनुसार नौ मास तक प्रवास वर्जित है।

चुस्त व गहरे रंग के कपड़े न पहने।

दिन में नींद व रात्रि को जागरण न करे। दोपहर को विश्रान्ति ले पर गहरी नींद वर्जित है।

अप्रिय बात न सुने व वाद-विवाद में न पड़े। मन में उद्वेग उत्पन्न करने वाले बीभत्स दृश्य, टी.वी. सीरियल न देखे व ऐसे साहित्य, कथाएँ पढ़े सुने नहीं। रेडियो व तीव्र ध्वनि भी न सुने।

सगर्भावस्था के दौरान समागम सर्वथा वर्जित है।

मैले, विकलांग या विकृत आकृति के व्यक्ति, रजस्वला स्त्री, रोगी एवं हीन शरीर वाले का स्पर्श न करे।

दुर्गन्धयुक्त स्थान पर न रहे तथा इमली के वृक्ष के नजदीक न जाय।

जोर से न बोले और गुस्सा न करे।

सीधे न सोकर करवट बदल-बदलकर सोये। घुटने मोड़कर न सोये।

शरीर के सभी अंगों को सौम्य कसरत मिले, इस प्रकार घर के कामकाज करते रहना चाहिए।

दर्द-निवारक (पेनकिलर) व नींद की गोलियों का सेवन न करे।

कुछ देर तक शुद्ध हवा में टहलना लाभदायक है।

सगर्भावस्था में प्राणवायु की आवश्यकता अधिक होती है, इसलिए दीर्घ श्वसन व हल्के प्राणायाम का अभ्यास करे। पवित्र, कल्याणकारी, आरोग्यदायक भगवन्नाम 'ॐ' कार का गुंजन करे।

मन को शांत व शरीर को तनावरहित रखने के लिए प्रतिदिन शवासन का अभ्यास अवश्य करे।

शांति होम एवं मंगल कर्म करे। देवता, ब्राह्मण तथा गुरुजनों की पूजा करे।

भय, शोक, चिंता व क्रोध को त्यागकर नित्य आनंद में रहे।

गर्भिणी पलाश के एक ताजे कोमल पत्ते को पीसकर गाय के दूध के साथ रोज ले। इससे बालक शक्तिशाली और गोरा उत्पन्न होता है। माता-पिता भले काले वर्ण के हों लेकिन बालक गोरा होता है।

 

बालक जन्मे तो क्या करें ?

बच्चे के जन्मते ही नाभि-छेदन तुरंत नहीं बल्कि 4-5 मिनट के बाद करें। नाभिनाल में रक्त-प्रवाह बंद हो जाने पर नाल काटें। नाल को तुरंत काटने से बच्चे के प्राण भय से अक्रान्त हो जाते हैं, जिससे वह जीवन भर डरपोक बना रहता है।

बच्चे का जन्म होते ही, मूर्च्छावस्था दूर करने के बाद बालक जब ठीक से श्वास-प्रश्वास लेने लगे, तब थोड़ी देर बाद स्वतः ही नाल में रक्त का परिभ्रमण रूक जाता है। नाल अपने-आप सूखने लगती है। तब बालक की नाभि से आठ अंगुल ऊपर रेशम के धागे से बंधन बाँध दें। अब बंधन के ऊपर स नाल काट सकते हैं।

नाभि-छेदन के बाद बच्चे की जीभ पर सोने की सलाई से (सोने की न हो तो चाँदी पर सोने का पानी चढ़ाकर भी उपयोग में ले सकते हैं) शहद और घी के विमिश्रण(दोनों की मात्रा समान न हो) से 'ॐ' लिखना चाहिए, फिर बच्चे को पिता की गोद में देना चाहिए। पिता को उसके कान में या मंत्र बोलना चाहिएः

ॐॐॐॐॐॐॐ... (सात बार ॐ) अश्मा भव। - तू ! पाषाण की तरह अडिग रहना।

ॐॐॐॐॐॐॐ... (सात बार ॐ) परशुः भव। तू ! कुल्हाड़ी की तरह विघ्न-बाधाओं का सामना करने वाला बनना।

ॐॐॐॐॐॐॐ... (सात बार ॐ) हिरण्यमयस्तवं भव। - तू ! सुवर्ण के समान चमकने वाला बनना।

ऐसा करने से बच्चे दूसरे बच्चों से अलग व प्रभावशाली होते हैं।

प्रथम बार स्तनपान कराते समय माँ पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे। स्तन पानी से धो के थोड़ा सा दूध निकलने देवे। फिर बच्चे को पहले दाहिने स्तन का पान कराये।

 

गर्भपात महापाप

ब्रह्महत्या से जो पाप लगता है उससे दुगना पाप गर्भपाप करने से लगता है। इस गर्भपातरूप महापाप का कोई प्रायश्चित भी नहीं है, इसमें तो उस स्त्री का त्याग कर देने का ही विधान है।

(पाराशर स्मृतिः 4.20)

यदि अन्न पर गर्भपात करने वाले की दृष्टि भी पड़ जाय तो वह अन्न अभक्ष्य हो जाता है। (मनुस्मृतिः 4.208)

गर्भस्थ शिशु को अनेक जन्मों का ज्ञान होता है। इसलिए 'श्रीमद् भागवत' में उसको ऋषि (ज्ञानी) कहा गया है। अतः उसकी हत्या से बढ़कर और क्या पाप होगा !

संसार का कोई भी श्रेष्ठ धर्म गर्भपात को समर्थन नहीं देता है और न ही दे सकता है क्योंकि यह कार्य मनुष्यता के विरूद्ध है। जीवमात्र को जीने का अधिकार है। उसको गर्भ में ही नष्ट करके उसके अधिकार को छीनना महापाप है।

गर्भ में बालक निर्बल और असहाय अवस्था में रहता है। वह अपने बचाव का कोई उपाय भी नहीं कर सकता तथा अपनी हत्या का प्रतिकार भी नहीं कर सकता। अपनी हत्या से बचने के लिए वह पुकार भी नहीं सकता, रो भी नहीं सकता। उसका कोई अपराध, कसूर भी नहीं है – ऐसी अवस्था में जन्म लेने से पहले ही उस निरपराध, निर्दोष, असहाय बच्चे की हत्या कर देना पाप की, कृतघ्नता की, दुष्टता की, नृशंसता की, क्रूरता की, अमानुषता की, अन्याय की आखिरी हद है।

स्वामी रामसुखदासजी

श्रेष्ठ पुरुषों ने ब्रह्महत्या आदि पापों का प्रायश्चित बताया है, पाखण्डी और परनिन्दक का भी उद्धार होता है, किंतु जो गर्भस्थ शिशु की हत्या करता है, उसके उद्धार का कोई उपाय नहीं है।

(नारद पुराणः पूर्वः 7.53)

संन्यासी की हत्या करने वाला तथा गर्भ की हत्या करने वाला भारत में 'महापापी' कहलाता है। वह मनुष्य कुंभीपाक नरक में गिरता है। फिर हजार जन्म गीध, सौ जन्म सूअर, सात जन्म कौआ और सात जन्म सर्प होता है। फिर 60 हजार वर्ष विष्ठा का कीड़ा होता है। फिर अनेक जन्मों में बैल होने के बाद कोढ़ी मनुष्य होता है।

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